व्याख्याता हिंदी 25

⏱ --:-- खुदसे प्लेस करो

V1HIND

0 / 45 प्रश्न हल किए
1 काव्य में 'भाव-सौंदर्य' का मूल आधार किसे माना जाता है?
2 काव्य-समीक्षा में 'शिल्प-सौंदर्य' के अनिवार्य घटकों का सही समूह कौन-सा है?
3 आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार 'नाद-सौंदर्य' किस माध्यम से कविता के प्रभाव और उसकी आयु को बढ़ाता है?
4 सूरदास के पद "मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी? कितिक बार मोहिं दूध पियत भई, यह अजहूँ है छोटी।" में निहित भाव-सौंदर्य का मुख्य आधार क्या है?
5 "उदित उदयगिरि मंच पर, रघुबर बालपतंग। बिकसे संत-सरोज सब, हरषे लोचन-भृंग॥" दोहे में कौन-सा प्रमुख शिल्पगत अलंकार-विधान है?
6 "पिउ सो कहेहु संदेसड़ा, हे भौंरा हे काग। सो धनि बिरहें जरि मुई, तेहि क धुवाँ हम लाग॥" नागमती-वियोग की इस पंक्ति में किस भाव-सौंदर्य एवं अलंकार का संयोग है?
7 "एक अचंभा देखा रे भाई, ठाढ़ा सिंघा चरावे गाई। पहिले पूत पाछे भई माई, चेला के गुरु लागे पाई॥" कबीर के इस पद में कौन-सा शिल्पगत विधान प्रमुख है?
8 "अँसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम-बेलि बोई। अब तौ बेलि फैलि गई, आणंद फल होई॥" पंक्तियों में मीराबाई के भाव-सौंदर्य की केंद्रीय विशेषता क्या है?
9 "अधर धरत हरि के परत, ओठ दीठि पट जोति। हरित बाँस की बाँसुरी, इंद्रधनुष रंग होति॥" दोहे में किस प्रकार का सूक्ष्म शिल्प-कौशल और अलंकार प्रयुक्त है?
10 "अति सूधो सनेह को मारग है, जहाँ नेकु नयानप बाँक नहीं।" घनानंद के इस सवैये में किस काव्य-गुण और भाषा-सौंदर्य की प्रधानता है?
11 "गुलगुली गिलमै, गंध गुनी झोलनि में, दिन कटि जात हैं बिलग ना बिलैस कै।" पद्माकर के इस कवित्त में शिल्प-सौंदर्य का कौन-सा तत्व सर्वाधिक चमत्कारी है?
12 "इंद्र जिमि जंभ पर, बाडव सुअंभ पर, रावन सदंभ पर, रघुकुल-राज हैं।" भूषण की इस रचना में किस रस, छंद और गुण का अनूठा शिल्पगत समन्वय है?
13 "नारी! तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास-रजत-नग-पग-तल में। पीयूष-स्रोत-सी बहा करो, जीवन के सुंदर समतल में।" प्रसाद जी ने नारी के किस उदात्त भाव-सौंदर्य को प्रतिष्ठापित किया है?
14 "रवि हुआ अस्त; ज्योति के पत्र पर लिखा अमर, रह गया राम-रावण का अपराजेय समर।" निराला की इस काव्य-पंक्ति में शिल्प-सौंदर्य की प्रमुख विशेषता क्या है?
15 "सिकता सुभग, सुरभित, श्यामल, भू के सुंदर प्रांगण में।" पंत जी की इस पंक्ति में शिल्प-सौंदर्य का कौन-सा संवेदी बिंब अत्यंत प्रखर है?
16 "मधुर-मधुर मेरे दीपक जल! युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल, प्रियतम का पथ आलोकित कर!" महादेवी वर्मा के काव्य में 'दीपक' किसका शिल्पगत प्रतीक है?
17 मैथिलीशरण गुप्त की पंक्ति "अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी।" में भारतीय नारी के किन दो भाव-पक्षों का कारुणिक सामंजस्य है?
18 "शांति नहीं तब तक जब तक न नर-भाग सुलभ हो, नहीं किसी को बहुत अधिक हो, नहीं किसी को कम हो।" दिनकर की इन पंक्तियों का केंद्रीय भाव-सौंदर्य क्या है?
19 नागार्जुन की कविता 'अकाल और उसके बाद' की पंक्तियों "कई दिनों तक चूल्हा रोया, चक्की रही उदास। कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उनके पास॥" में कौन-सा शिल्प-सौंदर्य विशेष प्रभावी है?
20 "ये उपमान मैले हो गए हैं, देवता इन प्रतीकों के कर गए हैं कूच। कभी बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है।" अज्ञेय के इस काव्य-शिल्प का मूल मंतव्य क्या है?
21 मुक्तिबोध की लंबी कविताओं (जैसे 'अंधेरे में') के शिल्प-विधान की सर्वाधिक विशिष्ट और अनिवार्य पहचान क्या है?
22 "प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे, भोर का नभ। राख से लीपा हुआ चौका, (अभी गीला पड़ा है)।" शमशेर बहादुर सिंह की इन पंक्तियों में किस प्रकार का शिल्प-सौंदर्य निखरा है?
23 "जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख, और इसके बाद भी अपनों से बड़ा तू दिख।" भवानी प्रसाद मिश्र की यह काव्य-पंक्ति किस शिल्पगत आदर्श को प्रतिपादित करती है?
24 धूमिल की पंक्ति "कविता क्या है? कोई मनोरंजन का साधन नहीं, वह भाषा में आदमी के होने की तमीज है।" काव्य-शिल्प और भाषा के किस संबंध को उजागर करती है?
25 नीचे अभिकथन (A) और कारण (R) दिए गए हैं। सही विकल्प चुनिए: अभिकथन (A): उत्कृष्ट काव्य में भाव-सौंदर्य और शिल्प-सौंदर्य एक-दूसरे से भिन्न रहकर भी आंतरिक रूप से संपृक्त होते हैं। कारण (R): भाव काव्य का आंतरिक प्राणतत्व है और शिल्प वह समर्थ माध्यम है जो उस भाव को मूर्त एवं संप्रेषणीय बनाता है।
26 सूची-I (काव्य पंक्ति) को सूची-II (उसमें निहित अलंकार) से सुमेलित कीजिए: सूची-I I. पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के II. चरण कमल बंदौ हरि राई III. कनक कनक ते सौ गुनी IV. सुबरन को ढूँढ़त फिरत, कवि व्यभिचारी चोर सूची-II 1. यमक 2. श्लेष 3. उत्प्रेक्षा 4. रूपक कूट: I II III IV
27 सूची-I (काव्य-पंक्ति) को सूची-II (प्रधान रस) से सुमेलित कीजिए: सूची-I I. बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय II. देखि सुदामा की दीन दसा, करुना करि कै करुनानिधि रोए III. बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी IV. कबहूँक हौं यहि रहनि रहौंगो, श्रीरघुनाथ-कृपा-कृपालु तें संत सुभाव गहौंगो सूची-II 1. करुण रस 2. शृंगार (संयोग) रस 3. शांत रस 4. वीर रस कूट: I II III IV
28 "रहिमन पानी राखिए, बिनु पानी सब सून। पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥" इस दोहे में भाव-सौंदर्य और शिल्प-सौंदर्य का कौन-सा अद्भुत सामंजस्य है?
29 सूरदास के 'भ्रमरगीत सार' में गोपियों के वाग्वैदग्ध्य (कथन-चातुरी) का मूल भाव-सौंदर्य किसमें निहित है?
30 बिहारी के दोहों के शिल्प-सौंदर्य के संदर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उनकी किस क्षमता की सर्वाधिक प्रशंसा की है?
31 जायसी के 'पद्मावत' में नागमती के वियोग-वर्णन के अंतर्गत प्रयुक्त 'बारहमासा' पद्धति शिल्प की दृष्टि से क्या कार्य करती है?
32 "मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।" रसखान के इस सवैये में भाव-सौंदर्य की सर्वोच्च परिणति किस रूप में प्रकट हुई है?
33 "वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आए कुछ और निखर।" दिनकर की इन पंक्तियों में किस भाव का ओजस्वी प्रवाह है?
34 "छोड़ द्रुमों की मृदु छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया, बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन?" इस पद में पंत जी के काव्य का कौन-सा भाव-द्वंद्व व्यक्त हुआ है?
35 निराला के प्रसिद्ध शोकगीत 'सरोज-स्मृति' की पंक्ति "दुःख ही जीवन की कथा रही, क्या कहूँ आज, जो नहीं कही!" में भाव-सौंदर्य की कौन-सी रेखा खिंची है?
36 महादेवी वर्मा के काव्य के शिल्प-सौंदर्य में 'प्रगीत' (Lyric) की कौन-सी अनिवार्य विशेषता सर्वाधिक प्रखर है?
37 काव्य-शिल्प में 'बिंब' (Poetic Image) का मूल और अनिवार्य कार्य क्या होता है?
38 काव्य में जब कोई मूर्त वस्तु या उपमान किसी अमूर्त, व्यापक अथवा दार्शनिक विचार का प्रतिनिधित्व करने लगता है, तो शिल्प की दृष्टि से उसे क्या कहते हैं?
39 केदारनाथ अग्रवाल की कविता में "मैंने उसको जब-जब देखा, लोहा देखा। लोहा जैसे तपते देखा, गलते देखा, ढलते देखा।" 'लोहा' किस भाव और यथार्थ का शिल्पगत प्रतीक है?
40 मुक्तिबोध की पंक्तियों "ओ मेरे आदर्शवादी मन, ओ मेरे सिद्धांतवादी मन, अब तक क्या किया? जीवन क्या जिया!" में भाव-सौंदर्य की प्रमुख धुरी क्या है?
41 "हम नदी के पुत्र हैं, हम धार के सहचर, खोजते हैं जो किनारा, वे किनारे ही रहे। जो भँवर के वक्ष पर हँसकर तिरोहित हो गए, वे अमर पद-चिह्न जल के पृष्ठ पर लिख भी गए। रोकता तट का समर्पण, बाँधता कंकड़-किनारा, किन्तु सागर की पुकारें हैं हमारे रक्त में। हम न रुकते पत्थरों के व्यूह में, प्राचीर में, वेग ही संक्रांति है, गति ही हमारी मुक्ति है। जो थमे, वे सड़ गए, जो बह चले, पावन हुए, काल की छाती पे हमने पग धरे, नत सिर नहीं।" प्रस्तुत काव्यांश का केंद्रीय भाव-सौंदर्य क्या है?
42 "हम नदी के पुत्र हैं, हम धार के सहचर, खोजते हैं जो किनारा, वे किनारे ही रहे। जो भँवर के वक्ष पर हँसकर तिरोहित हो गए, वे अमर पद-चिह्न जल के पृष्ठ पर लिख भी गए। रोकता तट का समर्पण, बाँधता कंकड़-किनारा, किन्तु सागर की पुकारें हैं हमारे रक्त में। हम न रुकते पत्थरों के व्यूह में, प्राचीर में, वेग ही संक्रांति है, गति ही हमारी मुक्ति है। जो थमे, वे सड़ गए, जो बह चले, पावन हुए, काल की छाती पे हमने पग धरे, नत सिर नहीं।" --- काव्यांश में 'तट' और 'भँवर' क्रमशः किन जीवन-स्थितियों के शिल्पगत प्रतीक हैं?
43 "हम नदी के पुत्र हैं, हम धार के सहचर, खोजते हैं जो किनारा, वे किनारे ही रहे। जो भँवर के वक्ष पर हँसकर तिरोहित हो गए, वे अमर पद-चिह्न जल के पृष्ठ पर लिख भी गए। रोकता तट का समर्पण, बाँधता कंकड़-किनारा, किन्तु सागर की पुकारें हैं हमारे रक्त में। हम न रुकते पत्थरों के व्यूह में, प्राचीर में, वेग ही संक्रांति है, गति ही हमारी मुक्ति है। जो थमे, वे सड़ गए, जो बह चले, पावन हुए, काल की छाती पे हमने पग धरे, नत सिर नहीं।" काव्यांश की पंक्ति "काल की छाती पे हमने पग धरे, नत सिर नहीं" में कौन-सा प्रमुख अलंकार और भाव है?
44 "हम नदी के पुत्र हैं, हम धार के सहचर, खोजते हैं जो किनारा, वे किनारे ही रहे। जो भँवर के वक्ष पर हँसकर तिरोहित हो गए, वे अमर पद-चिह्न जल के पृष्ठ पर लिख भी गए। रोकता तट का समर्पण, बाँधता कंकड़-किनारा, किन्तु सागर की पुकारें हैं हमारे रक्त में। हम न रुकते पत्थरों के व्यूह में, प्राचीर में, वेग ही संक्रांति है, गति ही हमारी मुक्ति है। जो थमे, वे सड़ गए, जो बह चले, पावन हुए, काल की छाती पे हमने पग धरे, नत सिर नहीं।" प्रस्तुत काव्यांश के शिल्प-सौंदर्य की भाषा-गत विशेषता क्या है?
45 "हम नदी के पुत्र हैं, हम धार के सहचर, खोजते हैं जो किनारा, वे किनारे ही रहे। जो भँवर के वक्ष पर हँसकर तिरोहित हो गए, वे अमर पद-चिह्न जल के पृष्ठ पर लिख भी गए। रोकता तट का समर्पण, बाँधता कंकड़-किनारा, किन्तु सागर की पुकारें हैं हमारे रक्त में। हम न रुकते पत्थरों के व्यूह में, प्राचीर में, वेग ही संक्रांति है, गति ही हमारी मुक्ति है। जो थमे, वे सड़ गए, जो बह चले, पावन हुए, काल की छाती पे हमने पग धरे, नत सिर नहीं।" इस काव्यांश में कौन-सा रस और कौन-सा काव्य-गुण प्रमुख रूप से विद्यमान है?

Leave a Comment