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काव्य-समीक्षा में 'शिल्प-सौंदर्य' के अनिवार्य घटकों का सही समूह कौन-सा है?
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"हम नदी के पुत्र हैं, हम धार के सहचर,
खोजते हैं जो किनारा, वे किनारे ही रहे।
जो भँवर के वक्ष पर हँसकर तिरोहित हो गए,
वे अमर पद-चिह्न जल के पृष्ठ पर लिख भी गए।
रोकता तट का समर्पण, बाँधता कंकड़-किनारा,
किन्तु सागर की पुकारें हैं हमारे रक्त में।
हम न रुकते पत्थरों के व्यूह में, प्राचीर में,
वेग ही संक्रांति है, गति ही हमारी मुक्ति है।
जो थमे, वे सड़ गए, जो बह चले, पावन हुए,
काल की छाती पे हमने पग धरे, नत सिर नहीं।"
प्रस्तुत काव्यांश का केंद्रीय भाव-सौंदर्य क्या है?
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"हम नदी के पुत्र हैं, हम धार के सहचर,
खोजते हैं जो किनारा, वे किनारे ही रहे।
जो भँवर के वक्ष पर हँसकर तिरोहित हो गए,
वे अमर पद-चिह्न जल के पृष्ठ पर लिख भी गए।
रोकता तट का समर्पण, बाँधता कंकड़-किनारा,
किन्तु सागर की पुकारें हैं हमारे रक्त में।
हम न रुकते पत्थरों के व्यूह में, प्राचीर में,
वेग ही संक्रांति है, गति ही हमारी मुक्ति है।
जो थमे, वे सड़ गए, जो बह चले, पावन हुए,
काल की छाती पे हमने पग धरे, नत सिर नहीं।"
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काव्यांश में 'तट' और 'भँवर' क्रमशः किन जीवन-स्थितियों के शिल्पगत प्रतीक हैं?
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"हम नदी के पुत्र हैं, हम धार के सहचर,
खोजते हैं जो किनारा, वे किनारे ही रहे।
जो भँवर के वक्ष पर हँसकर तिरोहित हो गए,
वे अमर पद-चिह्न जल के पृष्ठ पर लिख भी गए।
रोकता तट का समर्पण, बाँधता कंकड़-किनारा,
किन्तु सागर की पुकारें हैं हमारे रक्त में।
हम न रुकते पत्थरों के व्यूह में, प्राचीर में,
वेग ही संक्रांति है, गति ही हमारी मुक्ति है।
जो थमे, वे सड़ गए, जो बह चले, पावन हुए,
काल की छाती पे हमने पग धरे, नत सिर नहीं।"
काव्यांश की पंक्ति "काल की छाती पे हमने पग धरे, नत सिर नहीं" में कौन-सा प्रमुख अलंकार और भाव है?
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"हम नदी के पुत्र हैं, हम धार के सहचर,
खोजते हैं जो किनारा, वे किनारे ही रहे।
जो भँवर के वक्ष पर हँसकर तिरोहित हो गए,
वे अमर पद-चिह्न जल के पृष्ठ पर लिख भी गए।
रोकता तट का समर्पण, बाँधता कंकड़-किनारा,
किन्तु सागर की पुकारें हैं हमारे रक्त में।
हम न रुकते पत्थरों के व्यूह में, प्राचीर में,
वेग ही संक्रांति है, गति ही हमारी मुक्ति है।
जो थमे, वे सड़ गए, जो बह चले, पावन हुए,
काल की छाती पे हमने पग धरे, नत सिर नहीं।"
प्रस्तुत काव्यांश के शिल्प-सौंदर्य की भाषा-गत विशेषता क्या है?
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"हम नदी के पुत्र हैं, हम धार के सहचर,
खोजते हैं जो किनारा, वे किनारे ही रहे।
जो भँवर के वक्ष पर हँसकर तिरोहित हो गए,
वे अमर पद-चिह्न जल के पृष्ठ पर लिख भी गए।
रोकता तट का समर्पण, बाँधता कंकड़-किनारा,
किन्तु सागर की पुकारें हैं हमारे रक्त में।
हम न रुकते पत्थरों के व्यूह में, प्राचीर में,
वेग ही संक्रांति है, गति ही हमारी मुक्ति है।
जो थमे, वे सड़ गए, जो बह चले, पावन हुए,
काल की छाती पे हमने पग धरे, नत सिर नहीं।"
इस काव्यांश में कौन-सा रस और कौन-सा काव्य-गुण प्रमुख रूप से विद्यमान है?